बीबीसीले खोल्यो नेपालको पोल
POSTED ON : DECEMBER 15, 2015, IN : NEWS
काठमाण्डु : भारतको चर्चित मिडिया बीबीसिले नेपालको पछिल्लो राजनीतिक घटनाक्रम र नाकाबन्दीको बारेमा गतिलो खुलासा गरेको छ ।
बीबीसी लेख्छ, ‘ भूकम्पले नेपालको संविधान बनायो । संविधानमा मधेसीको विरोध आन्दोलनमा बदलियो र नाकाबन्दी सुरु भयो । अहिले नाकाबन्दीका कारण नेपाल आर्थिकरुपमा कमसेकम १० वर्ष पछि धकेलिएको छ । नेपालका प्रधानमन्त्री ओली भन्दैछन् कि उनका विकासका सपना चकनाचुर भए । खासमा नेपाल भूकम्प, संविधान र नाकाबन्दी त्रीकोणीय अडानमा फसिरहेको छ । यसबाट कहिले निस्किन्छ कसैले भन्न सक्दैन ।
बीबीसीमा अघि भनिएको छ हो, ‘यही शिलशिलामा राजनीतिको सिलाइ उध्रिएको छ, भ्रष्टाचार, भाइ भतिजावाद र नेताको अहमता बाहिर देखिएको छ ।’
राजधानी काठमाण्डुमा राजनीतिको लडाइका कारण भूकम्प गएको ७ महिना बितिसक्दा पनि पीडितसम्म राहत नपुगेको बीबीसीमा उल्लेख छ । साथै विश्वभरबाट आएको ४.१ अर्ब डलरको कोष सुख्न लागेको छ ।
पढौँँ बीबीसीमा लेखिउको समाचारको पूर्ण पाठः
अनिल यादव वरिष्ठ पत्रकार, काठमांडू से
भूकंप ने नेपाल का संविधान बनवाया. संविधान से मधेसी विरोध फूट पड़ा और नाकेबंदी हुई. अब नाकेबंदी ने नेपाल को आर्थिक रूप से कम से कम 10 साल पीछे ठेल दिया है.
नेपाली प्रधानमंत्री केपी ओली कह रहे हैं कि उनके विकास के सपने चकनाचूर हो चुके हैं.
दरअसल नेपाल भूकंप-संविधान-नाकेबंदी के त्रिकोण से बनी अड़ान (गतिरोध) में फंस चुका है. कब निकलेगा ये कोई नहीं जानता.
हां, यह ज़रूर हुआ है कि इस सिलसिले ने राजनीति की सिलाई उधेड़ दी है जिससे भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और नेताओं के अहम की टकराहट सब दिखाई देने लगे हैं.
राजधानी काठमांडू में राजनीति के अखाड़चियों के दांव पेंचों के कारण भूकंप के सात महीने बाद भी भूकंप पीड़ितों तक राहत नहीं पहुंच पा रही है जबकि दुनिया भर से मिला 4.1 अरब डॉलर (यानी लगभग 275 अरब रुपए) का फ़ंड पड़ा सूख रहा है.
नाकेबंदी से पैदा हुई ईंधन की क़िल्लत के कारण भूकंप प्रभावित पहाड़ी इलाक़ों में टेंटों में रह रहे लोगों की हालत बदतर हुई है क्योंकि ठंड बढ़ रही है, बर्फ़ गिरने के बाद कई जगहों पर तो पहुंचना भी मुमकिन नहीं रह जाएगा.
याद रहे कि इस साल अप्रैल और मई में आए दो भूकंपों में क़रीब नौ हज़ार लोग मारे गए थे, पांच लाख घर ध्वस्त हुए थे. देश के आधे से अधिक ज़िले भूकंप से प्रभावित हुए थे
पीड़ित परिवारों को अब तक सिर्फ़ 15 हज़ार रुपए की मदद मिली है,
हर परिवार को दो लाख देने का वादा किया गया था, लेकिन वह तब मिलेगा जब संसद नेपाल पुनर्निर्माण प्राधिकरण के गठन को मंज़ूरी देगी जिसके पास इस फ़ंड को ख़र्च करने का अधिकार होगा.
इन दिनों संसद चल रही है जिसमें यह बिल पास नहीं हो पा रहा है. पेंच यहां फंसा है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस पुनर्निर्माण प्राधिकरण और मधेसियों की मांग पर लाए गए संविधान संशोधन बिल को एक साथ पास कराना चाहती है.
मधेसी पार्टियों का मोर्चा प्राधिकरण बिल पर तो राज़ी है, लेकिन संविधान संशोधन बिल की अपने हितों के संदर्भ में चीरफाड़ करना चाहता है.
सरकार प्राधिकरण को तवज्जो दे रही है और मधेसियों को भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहती, लेकिन हंगामे के आगे लाचार है. लेकिन असली पेंच कहीं और है जिसे सभी पार्टियों के नेता ‘ऑफ़ द रिकार्ड’ स्वीकार करते हैं.
रस्साकशी इस बात को लेकर चल रही है कि अरबों के फ़ंड को ख़र्च करने वाले पुनर्निर्माण प्राधिकरण का प्रमुख किस पार्टी का आदमी बनेगा. यही सबसे बड़ी अड़ान है जिसके कारण भूकंप पीड़ितों तक मदद नहीं पहुंच पा रही है.
इस बीच नेपाल से 35 साल से नीचे के 100 युवाओं का एक दल चीन के बुलावे पर सिचुआन प्रांत के भूकंप पीड़ित कुमिंग और चेंन्डुंग ज़िलों का हाल जानने गया है. इसमें से 83 नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत माओवादी) के नेताओं के रिश्तेदार और 17 बड़े अफ़सरों के बच्चे हैं जिनमें से बहुतेरे नेपाल के भूकंप पीड़ित इलाक़ों के भी नहीं हैं.इनमें नेकपा (ए-माओवादी) के चेयरमैन पुष्प कमल दहल यानी प्रचंड के नातेदारों के चार बच्चे और इसी पार्टी के गृहमंत्री शक्ति बसनेत की दो बेटियां संगम और बबीता भी शामिल हैं.
नेपाली मीडिया द्वारा इसे फ़ैमिली पिकनिक बताकर खिंचाई करने के बाद प्रचंड ने गृहमंत्री को कहा है कि वे पार्टी की छवि ख़राब करने वाले काम न करें. गृहमंत्री बग़लें झांक रहे हैं.
भूकंप की आपदा के कारण ही नेपाल की राजनीतिक पार्टियों में सहमति बनी थी कि जल्दी से संविधान बनाकर राजनीतिक अस्थिरता ख़त्म की जाए ताकि पुनर्निर्माण का काम तेज़ी से व्यवस्थित ढंग से हो सके.
यही वजह थी कि चार साल के लिए बनी संविधान सभा ने दो साल में काम निपटाया लेकिन जो संविधान बना वह मधेसियों को मंज़ूर नहीं था. इसी कारण भारत-नेपाल सीमा की नाकेबंदी और संविधान में संशोधन की नौबत आई.
पूरे आसार हैं कि संविधान में संशोधन के बाद मधेसियों की कामयाबी से प्रेरित होकर नेपाल के आदिवासी और दूसरे वंचित तबक़े भी सत्ता में हिस्सेदारी और नौकरियों में आरक्षण की मांग करेंगे जिससे अस्थिरता का दौर लंबा चलेगा.
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